kabir

अवघट 3

गोपाल सिंह चौहान

बहुत छोटा था तो घर के पिछवाड़े के मंदिर में जाया करता था। वहां हर शनिवार को सुंदरकांड के पाठ में जाना और रामायण सुनना मुझे क्यों अच्छा लगता यह मुझे उस समय भी पता नहीं था और आज भी नहीं जानता। यह सगुण और निगुर्ण के बीच एक ऐसा अध्यात्म मुझे महसूस होता है जिसकी कोई वैचारिक पृष्ठभूमि मेरे जहन में नहीं है। मैं यह भी स्वीकार करता हूं कि यह मेरी खण्डित मान्यताओं से उपजा हुआ एक ऐसा अध्यात्म है जिसे हिन्दू होने के नाते मैंने आत्मसात किया। तुम तो ना हिन्दु हो और ना ही मुसलमान। तुम्हारा खेल तो दोनों या तीनों या हजारों में चलता है साधो!

हिन्दू कहूं तो हूं नहीं
मुसलमान भी नाहीं

अवघट 2

गोपाल सिंह चौहान

तुम्हारी गुनगुनाहट, तुम्हारा नाद और तुम। कितनी चोटें हैं मेरे पास तुम्हारी दी हुई। तंबूरे के एक एक तार के साथ चुभते हो सूल की तरह। और कोई रास्ता ना मिला तो शब्द बनकर आये। मैं अब शांत हूं और चुप भी। कितनी आसानी से कह दिया कि ये देखो ''शब्द की चोट''!! तुम अपने साधो से खेलते हो कबीर!! ये शब्द शब्द कहते कहते कब नि:शब्द की चोट मारोगे यह कौन जाने?

'' अब लफ़्ज-ओ-बयान सब ख़त्म हुए
अब लफ़्ज-ओ-बयान का काम नहीं
अब इश्क़ है ख़ुद पैग़ाम अपना
और इश्क़ का कुछ पैगाम नहीं ''

अवघट

गोपाल सिंह चौहान

कबीर एक खोज है एक ऐसी यात्रा जिसका ना कोई पड़ाव और ना कोई मंजिल। मंजिल या तो जाने के लिए होती है या पाने के लिए लेकिन यह तो एक अनजाना सा अनुभव है जिसका होना ही भीतर एक गुदगुदी पैदा करता है। एक ऐसी उर्जा जो अपने भीतर करोड़ों छिद्रों से होती हुई आपको तड़पने के लिए मजबूर करती है। यह कभी 'हां और ना' के बीच का अंतराल बन कर गुनगुनाती है तो कभी 'सब हैं हम माय' का खेल रचते हुए हमें 'बहुरी अकेला' छोड़ देती है।

"हां कहूं तो है नहीं, ना भी कहयो नहीं जाए
हां और ना के बीच में, मोरा सद्गुरू रहा समाए"

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