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मीडिया साक्षरता: एक नई उम्मीदगोपाल सिंह चैहान इस देश के बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि आज के दौर में हम सभी 'नॉलेज सोसायटी' का हिस्सा हैं, जिसमें ज्ञान के एक बड़े हिस्से को समाज के सभी वर्गों तक पंहुचाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मीडिया के कंधे पर है। लोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में भी मीडिया से इस तरह के योगदान की अपेक्षा पहले भी थी और आज भी है। किसी भी नैतिक समाज के निर्माण के लिए यह जरूरी है कि उसका आधार एक सही ज्ञान की जड़ों से जुड़ा हो। यूनेस्को की एक रिपोर्ट "The World Ahead: Our Future in the Making", में यह साफ रेखांकित किया गया है कि किसी भी नैतिक समाज का निर्माण बाजार नहीं कर सकता। यह अलग बात है कि यदि आज हम पहले से अधिक एक असमान समाज की सच्चाई में जी रहे हैं तो इसकी जिम्मेदारी बाजार के अलावा मीडिया के ऊपर भी है। उदारीकरण की प्रेरणा से भारत में पिछले कुछ सालों से उपजी 'सूचना क्रांति' की सबसे सफल संतान 'मीडिया' ने सभी ज्ञान परंपराओं को पछाड़ते हुए समाज की शिक्षा की दिशाओं को एक नये ढर्रे में मोड़ दिया। समाचार, दृश्य और विश्लेषण की त्रिआयामी जकड़ आज हर आदमी को यह जानने के लिए मजबूर कर रही है कि देश और विश्व में इस समय क्या चल रहा है। घटनाएं व्यक्तियों से ज्यादा महत्वपूर्ण लगने लगी हैं। धीरे-धीरे पैसे की बेशुमार आवक से इसमें फैशन, ब्यूटी, अपराध, हत्याएं इस कदर शामिल होती गयीं जहां से सच्चाई और नैतिकता का विचार ही एक अपराध बोध की तरह लगता है। उसने ज्ञान का हिस्सा बनने से कहीं ज्यादा बाजार का हिस्सा बनना पसंद किया। यही कारण है कि आज स्कूली या अन्य औपचारिक, अनौपचारिक शिक्षा माध्यमों से जुड़े चितंक, लेखक, विश्लेषक या नीति निर्देशक 'मीडिया साक्षरता' को पाठ्यक्रम का आवश्यक अंग मानने लगे हैं। वो इस बात पर जोर दे रहे हैं कि इस देश में पढ़ने वाले छात्र यह समझें कि समाज और संस्कृति की चेतना में मीडिया आज क्या भूमिका निभा रहा है। 'मीडिया साक्षरता' इस देश के लिए एक नयी अवधारणा है। लेकिन विश्व के कई हिस्सों में विशेषकर विकसित राष्ट्रों में बहुत सालों से इसको लेकर प्रयोग किये जा रहे हैं। भारत में 'मीडिया साक्षरता' पर कितना काम हुआ है और इसके क्या परिणाम दिखाई दे रहे हैं, अभी इस पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन यह जरूर देखा जा सकता है कि एनसीईआरटी (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद) के अलावा अन्य संस्थाओं, स्कूलों के अलावा बड़ी संख्या में अध्यापकों और शिक्षा-शोध से जुड़े लोग इसको लेकर काफी गंभीर हैं। पिछले दिनों कम्यूटिनी फेलाशिप यात्रा के 'ट्रैवल एण्ड राईट' कार्यक्रम के अन्तर्गत कोलकाता में 'मीडिया साक्षरता' पर शोध और पाठ्यक्रम निर्माण पर प्रोजेक्ट कार्य कर रही कम्यूटिनीयर फेलो सुदेबी ठकुराता के प्रोजेक्ट को करीब से समझने का मौका मिला। अपने प्रोजेक्ट में उन्होंने इस बुनियादी सवाल को बहुत ही गंभीरता से उठाया है। चूंकि कोलकाता एक मेट्रो शहर है इसलिए वहां के स्कूलों और अन्य शिक्षा केन्द्रों में पढ़ने वाले छात्रों पर मीडिया के प्रभावों और संदर्भों को अधिक गहराई से समझना छोटे शहरों और कस्बों की तुलना में अधिक आसान है। स्कूली शिक्षा में 'मीडिया साक्षरता' पर अलग से पाठ्यक्रम की जरूरत पर उसका मानना है कि, जिसे हम 'मीडिया साक्षरता' या 'मीडिया शिक्षा' कह रहे हैं उसका संबंध केवल मीडिया के उत्पादों तथा प्रिंट या इलेक्ट्रोनिक मीडिया की पड़ताल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके जरिए छात्रों में विज्ञापन, एक तरफा रिपोर्टिंग, समाचारों के प्रति अनावश्यक संवेदनाएं और उनका बाजारीकरण और पूर्वाग्रहों के प्रति एक आलोचनात्मक नजरिया भी विकसित करना अधिक महत्वपूर्ण है। यह पाठयक्रम केवल स्कूली शिक्षा का ही हिस्सा नहीं बने बल्कि यह मनुष्य के उन सभी व्यवहारगत आयामों से भी संबंधित हो जिसमें वह अपने और दूसरों के लिए मान्यताओं का निर्माण करता है। विभिन्न स्कूलों, आयु वर्गों व कक्षाओं के छात्रों से बातचीत और लम्बी चर्चाओं से यह निकलकर आया कि बच्चों पर मीडिया का प्रभाव एक आयामी नहीं है बल्कि वह बच्चों के मस्तिष्क पर स्वयं और समाज से लेकर उसकी सामाजिक पहचान, संघर्ष, हिंसा, भावनाएं और आस-पास के पर्यावरण पर एक साथ और कभी-कभी एक तरफा प्रभाव भी डालती है। इस पाठ्यक्रम का एक बड़ा हिस्सा मीडिया के उन तीन बड़े मनोवैज्ञानिक कारकों और उनके अंतरसंबंधों पर आधारित होगा जिनके सबसे ज्यादा शिकार छोटी उम्र के बच्चे बनते हैं। किस प्रकार मीडिया इन बच्चों की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया में सेंध डालकर उनके निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करता है, किस प्रकार एक बच्चा उपभोक्ता बन जाता है और कैसे मीडिया उसके अधिकारों को छीन कर उसे अपने हाथ का खिलौना बना लेता है? मीडिया साक्षरता या शिक्षा पर आधारित इस पाठ्यक्रम के बुनियादी लक्ष्य हैं बच्चों की स्वयं के बारे में समझ, समाज में उनकी भूमिका और उनके ऊपर हो रहे मीडिया के प्रभावों की समझ। वे यह समझ सकें कि टीवी पर अथवा अन्य माध्यमों से आने वाले विज्ञापनों और उसके उत्पादनों का उसकी खुद की वास्तविकता से आखिर रिश्ता क्या है। ये छवियां और रिश्ते यदि एक प्रकार से अपने आप बनते हैं तो उसे मीडिया किस प्रकार दूसरी तरफ से गढ़ता है। कोलकाता जैसे बड़े शहरों में लोगों की जिन्दगी का एक बड़ा हिस्सा मीडिया के प्रभावों से इस प्रकार घिर चुका है जहां उनके खाने से लेकर जाने-आने तक को बाजार मीडिया के माध्यम से नियंत्रित करता है। 'मीडिया साक्षरता' की भाषा में यह एक ऐसा अलोकतांत्रिक हस्तक्षेप है जिसमें आपकी किसी प्रतिक्रिया और विरोध के लिए कोई जगह नहीं हैं। किसी भी विज्ञापन और सीरियल को देखते हुए दर्शक के पास विरोध या असहमति का कोई अधिकार नहीं बचता जिससे वह उन प्रभावों में हस्तक्षेप कर सके जो उसके दिमाग या दिल पर होता हैं। मीडिया के लोकतांत्रिक होने या नहीं होने का सवाल तब तक कोई अर्थ नहीं रखता जब तक वह यह स्वीकार नहीं कर ले कि उसका अपना कोई वैचारिक एजेंडा है जहां मीडिया अपने आप को इन सवालों से रूबरू होने के लिए तैयार कर सके। यह विचार से कहीं ज्यादा एक नैतिक प्रश्न भी है जो समाज के मूल्यों को एक दिशाहीन रफ्तार का शिकार बना रही है। इसके जवाब में सुदेबी की एक महत्वपूर्ण और रचनात्मक पहल 'मीडिया साक्षरता' को जीवन कौशल से जोड़ कर देखना है। अपने शोध के दौरान वह बच्चों के साथ अपनी शुरूआती बातचीत आगे बढ़ा रही थी तभी उसे यह जानने में दिलचस्पी हुई कि क्या मीडिया साक्षरता को जीवन कौशल के रूप में समझा और समझाया जा सकता है? दरअसल मीडिया साक्षरता को यदि प्रशिक्षण के रूप में देखें तो इस प्रकार के प्रशिक्षण बच्चों को वैसी ही तकनीक और विश्लेषण के लिए तैयार करती है जो उनके जीवन कौशल का हिस्सा है। उसका कहना है कि एक मीडिया साक्षर व्यक्ति सही अर्थों में जीवन कौशल में ही पारंगत होता है, जिसमें वह लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को समझते हुए एक सक्रिय नागरिक की भूमिका के लिए तैयार होता है। निश्चित रूप से देश के अन्य हिस्सों में स्कूलें और अध्यापक विभिन्न तरीकों से 'मीडिया साक्षरता' को प्रचलित पाठ्यक्रमों में विभिन्न तरीकों और उपायों से शामिल करने का प्रयास कर रही होंगी लेकिन मीडिया के प्रभावों की गंभीरता को देखते हुए यह आवश्यक है कि प्राथमिक व माध्यमिक तक के विद्यार्थियों के लिए 'मीडिया शिक्षा' को अनिवार्य समझ कर लागू किया जाए। इसके लिए आवश्यक है कि इन पाठ्यक्रमों को स्थानीय जरूरतों व समस्याओं को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया जाए। बहुत अधिक भाषायी उलझनों से बचते हुए हमें इस देश के बच्चों की मानसिकता को समझते हुए रचनात्मक तरीकों से मीडिया साक्षरता को बढ़ावा देना होगा। सुदेबी के लिए बड़ी चुनौती यही होगी कि वह इस तरह के पाठ्यक्रम के निर्माण में किन-किन तरह के रचनात्मक और सरल आधारों का उपयोग कर पायेगी। पाठयक्रम के संदर्भ में यह एक जरूरी विचार है कि इस तरह के पाठयक्रम बहु आयामी होने के साथ-साथ विविधता भरे और स्थानीय परिवेश और भाषा से जुड़े हों। कला विधाएं इसमें एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसके माध्यम से इस पूरी प्रक्रिया को न केवल रोचक बनाया जा सकता है बल्कि यह अधिक संप्रेषणीय भी बनता है। सुदेबी इसकी विधाओं को लेकर पूरी तरह से सजग है और वह अपने पाठ्यक्रम को एक बहुआयामी आकार देना चाहती है। इसके लिए वह इसमें संगीत, कहानी, रचनात्मक लेखन, पेटिंग, अभिनय, नाटक तथा दृश्य-श्रव्य जैसी विधाओं को सम्मिलित करेगी। ऐसे पाठयक्रम को इस तरह के नये प्रयोगों से जोड़कर देखना एक नवाचार हो सकता है क्योंकि अब ऐसे प्रयोगों की न केवल मांग बढ़ रही है बल्कि यह प्रभावी रूप से बच्चों को आकर्षित भी कर रहा है। अभी यह आकर्षण बाजार से प्रेरित है और शिक्षा के संदर्भ में इसका बहुत सकारात्मक उपयोग नहीं हुआ है। इसलिए इस दिशा में संभावनाओं और रचनात्मकता की उम्मीद बनती है। चूंकि इस पाठ्यक्रम के महत्वपूर्ण आधार उन बच्चों के साथ होने वाली बातचीत, व्यक्तिगत तथा सामूहिक साक्षात्कार, कार्यशालाएं, चर्चाएं व बहसों से निकलेंगे जिनके लिए यह पाठ्यक्रम बन रहा है। इसलिए इसके संप्रेषणीय व सरल होने के रास्ते भी आसानी से निकल आएंगे। इस प्रोजेक्ट में एक नया और परिपक्व विचार यह भी है कि सुदेबी जेंडर, औरत हिंसा, पर्यावरण और प्रथाओं जैसे विषयों को बच्चों व युवाओं के नजरिये से समझना चाहती है। इस बारे में उसका कहना है कि ''मैं इन सब चीजों के बारे में अपने विचार या राय नहीं देना चाहती बल्कि यह देखना चाहती हूं कि ये मुद्दे उनकी नजर में क्या मायने रखते हैं या वे कहां इनके कारण खोजते हैं।'' शिक्षा में शून्यता की कोई जगह नहीं है और सामाजिकता को इससे अलग करके देखना एक एकांगी विचार है। लोगों को अपने नजरिये से देखने से कहीं ज्यादा जरूरी है उन्हें उनकी नजर से देखना। इसके अलावा वह इस विषय पर काम करने वाले शिक्षकों व अन्य चितंको से भी राय-विमर्श कर रही है जिससे समय-समय पर दिशा और मार्गदर्शन भी मिलता रहे। सुदेबी को इस शोध में इस तथ्य के प्रति भी सजग रहना होगा कि इस देश में स्कूली शिक्षा में पाठयक्रम और परीक्षा से जुड़े सवालों को हल करने में या तो हम कुछ बुनियादी गलतियां कर रहे हैं या अभी तक हम उन बुनियादी सवालों को समझ ही नहीं पाये हैं। एनसीईआरटी के नेशनल करीकुलम फ्रेमवर्क (NCF) 2005 में भी बिना बोझ की शिक्षा (Learning without burden) और शिशु-केन्द्रित शिक्षा (Child centered education) जैसे जुमलों पर बहुत अधिक जोर दिया गया है। इस फ्रेमवर्क में यह सुझाया गया है कि पाठयक्रम से जुड़ी पुरानी मान्यताओं और बने-बनाये अभ्यासों से मुक्ति लेनी होगी और शिक्षा को बच्चों के लिए एक रोचक अनुभव में बदलना होगा। दरअसल शिक्षा में पाठयक्रम का किताबों और ब्लैक बोर्ड के अलावा एक रचनात्मक आयाम भी है जिसे अब तक हमारी पूरी स्कूली व्यवस्था ने नज़रअंदाज किया है। इस कारण से प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक यह विद्यार्थियों के लिए एक ऐसी बोझिल प्रक्रिया बन जाती है और स्कूल से जुड़ने के बाद से ही बच्चे का एक मात्र लक्ष्य पढ़ना नहीं बल्कि उस प्रक्रिया से मुक्ति पाना रह जाता है। वह कक्षा में हर पल इसके लिए संघर्षरत रहता है और ड्रॉप आउट दर से आप यह अंदाजा लगा सकते हैं कि गावों के अधिकांश बच्चे तो इस संघर्ष में जीत ही जाते हैं। सुदेबी यदि अपने इस पाठ्यक्रम में इन सवालों के उत्तर ढूंढ पाती है और इस दिशा में यदि कुछ कामयाबी हासिल कर पाती है तो इसे शिक्षा में एक महत्वपूर्ण योगदान कहा जा सकेगा। ऐसे पाठ्यक्रम निश्चित तौर पर वर्तमान बोझिल शिक्षा और मीडिया की आग से झुलस रहे बच्चों पर ठंडे पानी के कुछ छींटे डाल सकते हैं। |
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