Navigation |
मध्यप्रदेष में छात्र कब तक गैर-राजनीतिक रहेगाआनन्द वर्मा मध्यप्रदेश में छात्रों के सामने हमेशा एक उलझन रहती है, जब वो कॉलेज जाते हैं। उस दौरान परिसर में राजनीति करने वाले छात्र संगठन उन्हे अपने दल में शामिल करने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन देते है। सम्भव है कि अन्य विकल्प न होने के कारण कुछ छात्र इन संगठनों के साथ जुड़ते हों। कुछ छात्रों को जबरदस्ती सदस्यता शुल्क वसूलकर संगठनों का सदस्य बना लिया जाता है। अधिकतर छात्रों को इन राजनैतिक छात्र संगठनों से कोई सरोकार नहीं होता है, क्योंकि वे जानते हैं कि मध्यप्रदेश के छात्र संगठनों का कोई चरित्र ही नहीं है। छात्रों को अक्सर यह सुनने को मिलता है कि ''घर से सीधे स्कूल-कॉलेज जाओ, वहाँ से सीधे घर आओ। अपने कैरिअर पर ध्यान दो। राजनीति के चक्कर में मत पडा़े। राजनीति तो गुण्डो का काम है।'' आज समाज के एक बडे हिस्से में राजनीति की यही तस्वीर है। इस प्रकार के विचार तब और मजबूत होते हैं जब उज्जैन में संघ परिवार से जुडे छात्र संगठन विद्यार्थी परिषद द्वारा प्रो. सब्बरवाल जैसे लोगों की हत्या की जाती है। मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार अपराधी छात्रों को बचाने के लिए जी जान लगा देती है तथा हत्याकांड को हादसा बताने का प्रयास करती है। छात्र राजनीति के अपराधीकरण की यह कोई नई घटना नहीं थी। जब पूरी भारतीय राजनीति में धन-बल का बोलबाला हो तब छात्र राजनीति अपराधीकरण से कैसे अछूती रह सकती है। तब क्या पूरे भारत में चुनावी प्रक्रिया को बंद कर दिया जाए। जिस प्रकार भारत के अधिकांश विश्वविद्यालयों और कालेजों में छात्र संघ चुनावों पर प्रतिबंध लगाया गया है यदि उसी सोच पर चला जाए तब हमें अपने सारे लोकतांत्रिक अधिकारों को छोड़ना पड़ेगा जिसे हमने लम्बे संघर्ष के बाद हासिल किया है। मसला अपने अधिकारों को छोडने का नहीं है बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को और व्यापक करने का है तथा उसमें सभी की भागीदारी सुनिष्चित करने का है। गौरतलब है कि उज्जैन शहर के कुछ छात्रों ने फीस वृद्धि के विरोध में प्रदर्शन किया। वाजिब मांगों के लिए प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने लाठियों-हाकियों से हमला कर उन्हें भगा दिया और इस प्रकरण में पुलिस प्रशासन भी शामिल था। पिछले वर्ष अपने प्रगतिशील चरित्र के लिए पहचाने जाने वाले नई दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्रों ने वहाँ पर काम करने वाले निर्माण मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी तथा अन्य सुविधाएं दिए जाने की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया। तब विश्वविद्यालय प्रशासन ने कहा कि यह छात्रों का काम नहीं है और उन्हें इससे दूर रहना चाहिए। लेकिन छात्रों ने मजदूरों की मांगों के लिए अपना आंदोलन जारी रखा तो प्रशासन ने बतौर सजा 8 छात्रों को विश्वविद्यालय से निकाल दिया। एक तरफ तो विश्वविद्यालयों को देश के भावी नागरिकों के निर्माण की पाठशाला कहा जाएगा वहीं दूसरी ओर आप यह भी सिखाएंगे कि केवल अपने बारे में सोचो, अपने आस-पास की हकीकत से आँखें मूंदे रहो। जो अपने आस-पास हो रहे शोषण और अन्याय से कोई सरोकार नहीं रखते वे अपनी भाषा में ''समझदार'' तो हो सकते हैं लेकिन एक बेहतर नागरिक कभी नहीं हो सकते। हमारे समय में गैर-राजनीतिक होना बहुत अच्छी बात मानी जाती है लेकिन हम अपने जीवन में क्या पढ़ेंगे, क्या खायेंगे-क्या पहनेंगे, किस प्रकार का रोजगार पायेंगे आदि बातें राजनीति से तय होती हैं। मसलन कॉलेजों में लड़कियों के पहनावे पर फरमान जारी किए जाएंगे, युवाओं द्वारा प्यार करने तथा दूसरे धर्म या जाति में जीवन साथी चुनने पर धार्मिक उन्माद फैलाया जाएगा, जाति पंचायत बुलाकर सजा सुनाई जाएगी। यह उन लोगों और संगठनों की राजनीति है जो महिलाओं की स्वतंत्रता को नियंत्रित करना चाहते हैं, धार्मिक जकड़न तथा ऊँच-नीच पर टिकी जाति व्यवस्था को बनाए रखना चाहते हैं। इस प्रकार वे प्रत्येक युवा को भारतीय संविधान में मिली निजी स्वतंत्रता व सम्मान के अधिकार पर हमला करते हैं। छात्र गैर-राजनीतिक बने रहेंगें? बीते दो दशकों में निजीकरण व व्यवसायीकरण को सरकार द्वारा हर समस्या के समाधान के मूलमंत्र की तरह पेश किया जा रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में भी बाजार का बोलबाला है। निजी शिक्षण संस्थाओं (मैनेजमेंट, आईटी इत्यादि) की बाढ़ आई हुई है। यदि पैसा है तो आपको हर प्रकार के शिक्षा की डिग्रियाँ उपलब्ध हो सकती हैं और कहीं नही तो कॉल सेन्टर में नौकरी मिल जाएगी। इन कॉल सेन्टरों में कोई कर्मचारी अधिकार नहीं है। इनमें काम करने वाली पीढ़ी मानसिक अवसादों से गुजर रही है, जिन्हें लेकर अधिकांश छात्र रोजगार के बाजार में बेरोजगार घूम सकते हैं। वैसे तो हमारे देश में सबके लिए एक समान शिक्षा कभी भी हासिल नहीं थी! सरकारी और प्राइवेट स्कूल की दोहरी शिक्षा प्रणाली पहले से ही मौजूद थी। अब तो शिक्षा को घोषित रूप से मुनाफे का धंधा मान लिया गया है। उद्योगपतियों की ओर से सरकार को सौंपी गई बिरला-अम्बानी रिपोर्ट इसका नायाब उदाहरण है। सरकार इनको मुफ्त जमीन उपलब्ध कराती है, सुविधाएं देती है और ये लोगों की जेबों से लाखों की उगाही करते हैं। म.प्र. में सरकारी विश्वविद्यालयों से संबंधित प्राइवेट कॉलेज तो पहले से ही चल रहे हैं। अब सरकार ने म.प्र. के देवास शहर में प्रदेश का पहला प्राइवेट विश्वविद्यालय खोलने की इजाजत दी है। यह तो अभी शुरूआत है, आगे-आगे देखिए होता है क्या? अगर आपके घर में इनकी फीस जमा कराने के लिए पैसे नहीं हैं तो बैंक से कर्ज लेने की व्यवस्था भी कर दी गई है। यानी कि शिक्षा के इन दुकानदारों के मुनाफे में कोई कमी नही की गई है। क्या शिक्षा अमीरों के लिए पैसे कमाने का व्यवसाय बनी रहेगी या यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वो सबको निःषुल्क एक समान एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराए। हम जो भी सामान खरीदते हैं उस पर कर चुकाते हैं। हमारा ही पैसा सरकार हम पर खर्च नहीं करना चाहती! लेकिन हमारा ही पैसा सरकार इन उद्योगपतियों को छूट देने पर खर्च करती है, क्यों? अगर छात्र ये सब सवाल खड़े करने लगें तो यह राजनीति हो जाएगी। यदि सही प्रश्न खड़ा करना राजनीति है तो यह राजनीति की जानी चाहिए। म.प्र. में वर्तमान राजनति का माहौल अंधकारमय है। कभी-कभार छात्रों की किसी स्थानीय मांग के लिए छोटी-मोटी आवाज उठती है लेकिन कोई संगठित प्रतिरोध नहीं दिखता है। छात्र राजनीति के नाम पर भाजपा-कांग्रेस से जुड़े एबीवीपी, एनएसयूआई जैसे व्यवस्था पोषक छात्र संगठन ही दिखायी पड़ते हैं। इन संगठनों ने ही छात्र राजनीति को पैसे और गुण्डों का पर्याय बना दिया है। बल्कि जब छात्र अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होंगे और सक्रिय हस्तक्षेप करेंगे तब छात्र राजनीति पैसे और गुण्डों का नहीं सामाजिक परिवर्तन का पर्याय बनेगी। छात्रों ने हमेशा समाज परिवर्तन में अपनी महत्वपूर्ण भमिका निभायी है। चाहे वो आजादी का आंदोलन हो या आजादी के बाद 70 के दशक में में नक्सलबाड़ी और जे.पी. आंदोलन हो। शहीद भगतसिंह ने जब आजादी के आंदोलन में कदम रखा तब वो भी एक कॉलेज के छात्र ही थे। उन्होंने आजादी के आंदोलन में नये विचार, नये विकल्प और राजनीति को स्थापित किया। छात्रों को ज्ञान के अवसर उपलब्ध होते हैं। उनमें नये विचारों को पैदा करने और ग्रहण करने की क्षमता होती है। जो समाज को नई दिशा दे सकती है। आपको अपनी भूमिका तय करनी है। |
Search |