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Reply to commentविचारों से होती है प्रगतिशेहनाझ मालिक ये तब की बात है, जब इस दुनिया में आई ही नहीं थी, उस वक्त हमारा देश आजाद हो रहा था। गुलामी से, अंग्रेजों के शासन से आजादी की खुशी थी और एक तरफ जलन। व्यक्तियों के लिए ऐसी चिंगारी ने जन्म लिया जो 50 साल पहले लगी थी पर आज की हर धमाकों में आग लगाती हुई दिखती है। उन्हीं सब में एक ऐसी चिंगारी थी जो सभी में थी, हर इंसान के मन में है, वो है ‘इंसानियत’ जो एक इंसान को दूसरे इंसान से बांधती हैं और शायद बांधती रहेगी! शायद इसलिए कहूंगी क्योंकि इंसानियत का जज्बा अपने कागार पर है या तो हम उसे बचा ले या फिर उसे खत्म कर दें। हमारे देश में बदलते घटनाक्रम इस बात के सबूत हैं कि इंसानियत कम हो रही है। कभी कहीं बम ब्लास्ट होता है तो देखा जाता है कि, हिन्दू का इलाका था या मुस्लिम का, अगर हिन्दू का था तो... ये बात कौन करता है? हम, आप, आम इंसान या हमारे राजनेता? हर धर्म एक ही बात बोलता है, एक ही बात समझता है सिर्फ बोली ही तो अलग है हिंदी, उर्दू, सिख या मराठी। लोग समझते हैं, जानते हैं पर अमल नहीं करते। जब कोई प्राकृतिक आफत आती है तो हम हिन्दू, मुस्लिम, इसाई सब एक हो जाते हैं। एक दूसरे की मदद करते हैं, एकजुटता और इंसानियत के सागर बहते हैं। जहां बुरा वक्त बीता फिर से भेदभाव शुरू हो जाता है। क्या हम सबको एक होकर रहने के लिए तीसरी ताकत का होना जरूरी है? बिना कोई आफत के हम एकजुट होकर नहीं रह सकते क्या...?? मैं आने वाले वक्त से उम्मीद कर रही हूं कि वो इस तरह के भेदभाव बदल देगी। और इंसा अल्लाह बदलाव होगा, वैश्वीकरण हो रहा है, हम पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित हो रहे हैं। फिल्म जगत, उद्योग जगत, सभी में तेजी से उछाल आया है पर एक ओर ऐसी भी चीज है जिसमें तेजी से गिरावट आई है और वो हमारी स्वतंत्रता। तीस साल पहले जब बच्चे थे तब सारा दिन खेला करते थे, यहां-वहां घूमा करते थे, खुला वातावरण था पर आजकल के बच्चे अगर एक घंटा भी बाहर होते हैं तो माता-पिता को घबराहट होती है कि हमारे बच्चे कहां हैं वो सही जगह तो खेल रहे हैं? सुरक्षा तो नाम भर के लिए भी नहीं रही। बच्चे अब बच्चे नहीं रहे, वक्त से पहले बड़े हो रहे हैं। आज हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, जहां एक आम व्यक्ति सहयोग, सुरक्षा, आत्मनिर्भरता की चाहत करता है। पर ऐसा नहीं है आज भी एक अकेली औरत कहीं आ या जा नहीं सकती। उसे बैकअप की जरूरत होती है अगर किसी लड़की को कॉलेज से आने में देरी हो जाए तो उसके घर आते ही पहले उसे सवालों के पुल से गुजरना पड़ता है। जैसे कि मैं अगर बाहर जाती थी तो मुझे घर में बताना पड़ता था कि मैं कहां जा रही हूं, कितने बजे आऊंगी, और कब वापस आऊंगी, किससे मिलने जा रही हूं या फिर कोई साधन है, इत्यादि। इतने सवालों का जवाब देने में मुझे बहुत तकलीफ होती थी, मैं खुद पर शक किया करती थी कि क्या मैं गलत हूं? जब घर वाले इतने सवालात करते हैं, तो बुरा लगता था मैं घर वालों को सीधे मुंह जवाब नहीं देती थी क्योंकि आत्मसम्मान बीच मे आड़े आती थी, पर जब पढ़ाई पूरी हुई और दुनिया को समझने का सिलसिला शुरू हुआ तब जाकर लगा है कि मैं भाग्यशाली थी कि मुझसे सिर्फ पूछा जाता था पर मुझे रोका नहीं गया। समाज में ऐसी भी लड़कियां हैं जिन्हें समाज की वजह से घर में बिठा लिया जाता है उन्हें जिंदगी की मूलभूत चीजें जैसे कि पढ़ाई भी करने नहीं मिलती। क्या इसे हम स्वतंत्रता कहेंगे। क्या इसे हम वैश्वीकरण कहेंगे। कहा जाता है कि किसी भी देश की प्रगति उसके गांव से होती है, पर मुझे लगता है कि किसी देश की, राज्य की, उसके नगर की, उसके मोहल्ले की, उसके घर की प्रगति, उसके विचारों से होती है। Reply |
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