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मैं, चकमक क्लब और स्वअनुशासन

इमरान, सतवास

सतवास में सरकारी और प्राइवेट स्कूल दोनों हैं। माना जाता है कि प्राइवेट स्कूलों में सरकारी स्कूलों की अपेक्षा अच्छी पढ़ाई होती है। इसीलिए यहां भी सामाजिक और आर्थिक उच्चवर्ग के लोगों के बच्चे प्राइवेट स्कूलों में ही पढ़ते हैं। निम्न वर्ग के कुछ ही बच्चे सस्ते प्राइवेट स्कूलों में पढ़ पाते हैं। बाकी सब गांव के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं।

सतवास में पांच शासकीय और बारह प्राइवेट स्कूल हैं। जिसमें आस-पास के गांव के बच्चे भी आते हैं। इन गांवों में भी जातिगत आधार पर ही बसाहट है और उच्चवर्ग का वर्चस्व है। इन गांवों में शासकीय प्राथमिक शालाएं हैं। आगे की पढ़ाई के लिए बच्चे सतवास के स्कूल में ही आते हैं। आमतौर पर लड़कियां अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ देती हैं। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण लड़को को साथ में मजदूरी भी करनी पड़ती है। जिसके कारण उन्हें कभी-कभी स्कूल से निकाल दिया जाता है। इन सारी दिक्कतों के बाद भी यहां के बच्चे किसी तरह पढ़ पाते हैं। आगे की जानकारी नहीं होने के कारण पढ़ाई बीच में ही बन्द कर देते हैं।

बच्चों के मन का तो स्कूल में कुछ नहीं होता। बच्चों के लिए कोई रोचक गतिविधि भी नहीं होती है। स्कूली किताबें तो कथाओं और उपदेशों से भरी होती हैं। पर बच्चों को तो कहानी, कविता, गीत की मजेदार पुस्तक पढ़ने में मजा आता है। घर की हालत कमजोर होने के कारण माता-पिता ये अतिरिक्त भार नहीं उठा पाते।

बच्चे अपनी कई प्रकार की क्षमताओं को व्यक्त नहीं कर पाते हैं। स्कूल में तो इसके लिए जगह ही नहीं होती है। वे या तो पढ़ाई की बोरियत भरी जिन्दगी को छोड़ देते हैं या फिर हाई स्कूल तक आते-आते छोड़ देते हैं। अगर हमें बच्चों की पढ़ाई को रोचक बनाना है तो उनके अन्दर दबे कौशल को देखकर, समझकर बाहर लाना होगा। शिक्षा का उद्देश्य है कि वह अचेतन मन से सचेतन मन की ओर ले जाए।

मैं प्राथमिक स्कूल में पढ़ता था। वहां रोज शिक्षक से डांट खाता। काम पूरा नहीं करने पर अक्सर मार पड़ती। मैं हमेशा बैटरी के पुराने सेल लेकर अपने एक दोस्त के साथ बैठकर बल्ब जलाया करता था। कभी शिक्षक की नजर पड़ जाती तो पिटाई होती। मेरे दोस्त के साथ केवल मैं अकेला होता क्योंकि वह कथित मेहतर था। जिससे सभी दूर रहते थे। उसका नाम संजू था। मैं उसके साथ खेलता तो मेरा बड़ा भाई कहता कि इसे नहलाओ ये भंगी के साथ खेलता है। मुझे ये बात अच्छी नहीं लगती थी कि उसे कोई भंगी कहे। वह रोज मेरे लिए कुछ ना कुछ खाने को भी लाता था। कभी इमली, कभी बेर, कभी जाम। हम दोनों पांचवीं तक साथ पढ़े। संजू फेल हो गया। मैं छठवीं की पढ़ाई के लिए बड़े स्कूल में जाने लगा।

माध्यमिक स्कूल में मेरे नए दोस्त बने। वे हमेशा स्कूल में कुछ खिलौने रंगीन कागज से बना के लाते और कभी-कभी कहानी की किताबें लाते। उनके पास में सारी चीजें देखकर मैंने पूछा तो बताते कि हमें यह सब चकमक क्लब में सिखाया जाता है। वहां हम अपने मन से कुछ भी कर सकते हैं। मेरे साथ मेरा दोस्त अफरोज पढ़ता था जो मेरे साथ रोज शाम को खेलता था। मैं रोज क्रिकेट खेलने के लिए उसे लेने जाता था। एक दिन अफरोज ने कहा आज मैं नहीं जाऊंगा। मैंने पूछा क्यों तो उसने कहा अब मैं शाकिर भैया के साथ कुछ सीखता हूं। मैंने उससे पूछा क्या वे पैसे से सिखाते हैं। तब अफरोज ने कहा नहीं। मेरे कहने पर अफरोज मुझे अपने साथ चकमक क्लब लेकर गया।

वहां सब बच्चे गोला बनाकर बैठे थे। अन्दर जाने पर एक भैया ने मुझे बुलाकर मेरा नाम बड़े प्यार से पूछा मैंने अपना नाम बताया। फिर भैया ने अपना नाम बताया-शाकिर। मैं रोज सभी बच्चों को गीत सुनाता हूं। फिर भैया ने सुनील और ताहिर से परिचय कराया। बताया कि सुनील आरीगेमी सिखाता है और ताहिर कहानी सुनाता है। मैंने सोचा ये लोग कितने बड़े-बड़े काम करते हैं।

सुनील ने कहा चलो गोले में बैठ जाओ। शकिर भैया ने गीत सुनाया ''नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए''। फिर सुनील ने हमें सितारा बनाना सिखाया। उसके बाद सभी बच्चे सामने रखी पुस्तकों में से अपनी पसंद की पुस्तक निकालकर एक रजिस्टर में लिख रहे थे। मैंने भी एक पुस्तक पसंद करके घर लेकर आया। अब मैं रोज चकमक क्लब जाने लगा। मेरा भाई भी मेरे साथ जाता था। पर वह केवल शनिवार के दिन ही जाता क्योंकि उस दिन प्रश्न मंच होता था। जो जीतता था उसे इनाम मिलता था।

कभी हम सारे बच्चे पुलिस थाने जाते थे और वहां क्या होता है वो जानते। इससे जो बच्चे पुलिस और थाने के नाम से डरते थे, उनका डर दूर होता जाता था। इसी प्रकार अस्पताल, नगर पंचायत में भी हम जाते थे। और वहां की जानकारियां लेते थे। जब अन्य बच्चों के माता-पिता को यह पता चलता तो वे भी बहुत खुश होते थे। हमारे अन्दर हर समय एक नया उत्साह होता था।

हमारे क्लब के 10-12 लोगों की टीम सतवास के आसपास के गांवों में जाकर बाल मेला आयोजित करती थी। इसके लिए सतवास के बाहर जाकर स्कूल में बात करना, बाल मेले की आज्ञा लेना, फिर बहुत सारी व्यवस्थाएं करनी होती थी। यह सब करने में हमें बहुत मजा आता और सीखने को भी मिलता। जिस गांव के स्कूल में बाल मेला होता वहां हमारे द्वारा की जाने वाली गतिविधियों के बारे में कोई एक साथी सब को जानकारी देता था। लोगों को आश्चर्य होता था। पहले घर के इस तरह के काम करने में डर लगता था। वो धीरे-धीरे समाप्त हो गया।

कुछ दिनों बाद मैं चकमक क्लब का स्रोत साथी बना। मीटिंग में सभी साथी सब कुछ मिलकर तय करते थे। मन में बड़ी अजीब सी खुशी होती थी। हमें घर में इस प्रकार की स्वतंत्रता नहीं मिली। पर चकमक क्लब में ये सब कुछ मिला था। हम कभी पिकनिक पर जाते तो पहले सब बच्चों के यहां जाकर पेरेन्ट (माता-पिता) से परमीशन लेते। हमारे साथ लड़कियां भी पिकनिक पर जाती थीं। जबकि गांव में इसे अच्छा नहीं माना जाता था पर हमारे ग्रुप की लड़कियां खुद घर जाकर अपने मम्मी-पापा को मनातीं थीं। धीरे-धीरे विश्वास बढ़ता गया।

पिकनिक पर जाना सभी का एक साथ मिलकर मस्ती करना खेलना और फिर खाना खाते समय एक दूसरे के साथ मिलकर खाना। तब कोई हिन्दू या मुसलमान नहीं होता था। शाम को लौटते हुए सब एक-दूसरे को घर तक छोड़ने जाते थे। उस समय मेरे मम्मी-पापा कहते थे 'तू इस तरह दूसरे के बच्चों को साथ ले जाता हैं कभी कुछ हो गया तो।' मैं उन्हें समझाता कि, 'हम सब स्वअनुशासन बना कर रखते हैं।' तो पापा का जवाब होता था, 'तू बड़ा हो गया है।' असल में बच्चों का और हमारा खुद का अनुशासन होता है। यह स्व-अनुशासन है जो बिना किसी पर लादे ही आ जाता है।

स्कूल में भी टीचर अब हमारे साथ अलग-सा व्यवहार करते। क्योंकि हम सब स्कूल में जाकर प्राचार्य से बात करते और हमारे बाल मेले में क्या होता है उसके बारे में बताते और फिर स्कूल में बाल मेला आयोजित करते थे। जो शिक्षक हमें किताबों में पढ़ाते थे। मैं उन्हें स्वयं बच्चों को करना सिखाता था। इस कारण अब शिक्षक भी हमसे बहुत खुश थे। गांव में जहां भी जाते हमें अलग से लोग जानने लगे थे।

हम लोगों बारहवीं की परीक्षा के बाद सतवास से इन्दौर चले गये और दूसरे साथियों को काम सौंप दिया। इसके बाद हम जब कभी आते तो कुछ नया करते थे। पर बाद में उन साथियों ने लगभग दो साल इस प्रक्रिया को चलाया और धीरे-धीरे बन्द हो गया। अब कभी हम सतवास जाते हैं तो बड़ा अजीब सा लगता है। पहले कभी कोई जातिगत आधार पर बंटा नहीं था। सब मिलकर काम को अंजाम देते थे। उस समय के जो साथी आज भी गांव में हैं' एक अलग सोच के साथ जीते हैं। वो जाति में और आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव नहीं करते हैं। वैज्ञानिक नजरिया रखते हैं। गांव की नई पीढ़ी अब धीरे-धीरे जातिगत आधार पर बंटने लगी है। जिन बच्चों को कविता, गाना चाहिए, मजे करना चाहिए आज वो हिन्दू-मुस्लिम की बात करते हैं। मन में एक अजीब सी टीस उठती है कि, पहले सा वो माहौल आज क्यों नहीं है। अगर इन्हें उस समय जैसा माहौल मिलता तो ये भी उन बाकी साथियों की तरह होते जो आज हैं।

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