Navigation |
Reply to commentगांव, सरकारी स्कूल और चकमक क्लबसुनील बागवान मेरे घर वाले मुझे और मेरे बड़े भाई को पढ़ाना चाहते थे। स्कूल ना जाने पर मेरी अक्सर पिटाई होती रहती थी। बस्ता लेकर घर से निकलना, किसी दोस्त के साथ खेत पर चले जाना या फिर कहीं खेलते रहना और स्कूल की छुट्टी के समय वापस घर लौट आना, लगभग हम चार-पांच दोस्तों की आदत बन गई थी। माता-पिता काम पर चले जाते थे। जब घर वालों को यह बात मालूम पड़ी तो मेरी जमकर पिटाई हुई। घर वाले अगले दिन कान पकड़कर स्कूल लेकर आए। घर और स्कूल में सख्ती कुछ ज्यादा ही बढ़ गई। समय किसी तरह बीतता गया। मैं पांचवीं पास हो गया। मगर स्कूल कोई अच्छी लगने वाली चीज तो थी नहीं। पांचवीं की परीक्षा के बाद गर्मी की छुट्टी चल रही थी। हम आठ-दस दोस्त एक कमरे में कठपुतली का खेल रहे थे। अखबारी कागज के नकली रुपए थे और अखबारी कागज के ही टिकट। अखबारी कागज, लकड़ी और पुराने कपड़ों से बनी थी कठपुतली। यह कठपुतली हमने एक दोस्त के यहां टीवी में देखकर बनाना सीखा था। इसी दौरान 21-22 वर्ष के चार-पांच लड़के आए हमसे मुस्कुराते हुए बातचीत शुरू की-''क्या कर रहे हो?, तुम्हारी कठपुतली तो बहुत सुन्दर है'' वगैरह-वगैरह। अन्त में पूछा कि, ''हमें एक बड़ा कमरा किराए पर चाहिए। यह मकान किसका है? क्या वो हमें किराए पर देंगे?'' बात आगे बढ़ी। हमने उन्हें मकान मालिक से मिलवा दिया। उन्होंने मकान किराए पर लेकर शुरू किया 'चकमक क्लब'। वे लड़के पिछले दो-तीन सालों से एकलव्य से जुड़े थे और चकमक क्लब के स्रोत साथी थे। मैं भी 'चकमक क्लब' जाने लगा। वहां तो बहुत ही अच्छा लगने लगा। वहां बच्चों के लिए पढ़ने की किताबें, तरह-तरह के खिलौने, कविता गाने-गवाने वाले भैय्या-दीदी थे। कागज के खिलौने, चित्र बनवाना और खेल खिलवाना भी वो वहां पर करवाते थे। रोज शाम को दो-तीन घंटे चकमक क्लब में जाना और वहां पर यह सब गतिविधियां मजे-मजे से करना सचमुच अच्छा लगता था। धीरे-धीरे हम बच्चों को वहां पर दूसरे भैय्या-दीदी की तरह गतिविधियां सिखाने के लिए ''स्रोत-साथी'' बनने का मौका मिला। हमारा नाम, गतिविधि का नाम, सप्ताह का दिन आदि दीवार पर लिख दिया गया। अब उसे हम अपनी-अपनी जिम्मेदारी समझ कर पूरा करते थे। कौन सा सामान लगेगा, ज्यादा बच्चे आ जाएंगें तो कैसे-कहां बिठाएंगे, सप्ताह और महीने की योजना बनाना, पुस्तकालय संभालना आदि सभी काम हम 14-15 साल के लड़के-लड़कियां गोल घेरे में बैठकर मीटिंग करते हुए तय करने लगे थे। सुबह होते ही हम बच्चों को चकमक क्लब के इन 2-3 घंटों का हर रोज इंतजार रहने लगा था। स्कूल, घर, मोहल्ले में हर समय हम लोग चकमक क्लब की ही बातें किया करते थे। स्कूल में भी अब मजा आने लगा था। स्कूल के शिक्षक-शिक्षिका अब हमसे बहुत ही अलग तरह से बातें करते थे। स्कूल में 26 जनवरी और 15 अगस्त पर होने वाले कार्यक्रमों में 'चकमक क्लब' के स्रोत-साथी बढ़-चढ़ कर भाग लेते थे। जागरूकता के लिए नाटक का मंचन और गीतों की प्रस्तुति के लिए हमारे 'चकमक क्लब' का स्थान पक्का रहता था। आसपास के गांवों के स्कूलों में भी हम चकमक क्लब के साथी 'बाल मेलों' का आयोजन करने लगे थे। चकमक क्लब में आने वाले बच्चों की रचनाओं और चित्रों के संग्रह ''अंकुर'' पत्रिका को स्कूल, बैंक, पुलिस थाना, दवाखानों, पंचायत, प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र आदि जगह हर महीने देने जाते थे। अधिकारियों, साथियों और बच्चों के पालकों को हम अपने चकमक क्लब और अंकुर पत्रिका के बारे में निःसंकोच बतलाते थे। अफरोज पठान, राजेश वर्मा, अभिषेक सोलंकी, रामाधार पलाश्या, ताहिर अली और राकेश बिनौले, संगीता सिसोदिया, अर्चना टोंग्या, दीपिका विकरवार आदि चकमक क्लब के स्रोत साथी रहे हैं। इसमें कुछ मुस्लिम थे और कुछ हिन्दू। कुछ लोग बाजार चौक में रहते थे, तो कुछ गांव के अंतिम छोर पर - चर्मकार मोहल्ले में। कुछ कोने पर बसे मेवाती मोहल्ले में ..... और कुछ....। इसमें कुछ साथियों के पिता मरे हुए जानवरों को उठाने का काम करते थे। कुछ साथियों के पिता भिक्षा मांगते थे, कुछ साथियों के पिता सरकारी नौकरी करते थे। कुछ के घरों में खेती होती थी तो कुछ के घरों में लकड़ी का सामान बनाने का काम होता था। कुछ साथियों के पिता ड्राइवर थे। कुछ के पिता मंदिर में पूजा करने का काम करते थे। हम सब चकमक क्लब के साथी सुख-दुख के भी साथी थे। साथ रहना, साथ-साथ चकमक क्लब जाना, एक-दूसरे के घर आना-जाना, पिकनिक-भ्रमण पर जाना, साथ खाना, सब कुछ मिलकर करते थे। मिलकर तरह-तरह की योजनाएं बनाना, कुछ नया करना - करते रहना यही हमारा सपना और सोच रहता था। जब हम देखते कि जात-पांत के नाम पर हमारे परिवार में, हमारे आस-पास भेद-भाव किया जा रहा है तब हमें गुस्सा आता था। जब हमें ऐसे लोग मिलते जो धार्मिक पाखंड और अंधविश्वासो की बातें करते तब हम विरोध करते थे। जब वे अपनी बेटियों, लड़कियों, बहनों को चकमक क्लब जाने पर रोक लगाते थे तब हम संवाद करते थे। हमें अच्छा लगता था जब हम पाते कि इस तरह के विरोध प्रदर्शन या संवाद करने पर लोग हमारी बात सुनने और समझने के लिए मजबूर होते थे। इन सबमें थोड़ी-सी भी सफलता हमें खुशी से भर देती थी। जब कोई बिना एन्ट्री किए चकमक क्लब से किताबें लेता या देता, चकमक क्लब के फेविकोल से कोई अपने घर पर फोटो चिपकाता या फिर चकमक क्लब के भीतर या किसी कार्यक्रम में कोई भी साथी अपने व्यवहार में किसी भी तरह की लापरवाही बरतता तो इन सब बातों पर हम आपस में झगड़ते थे। बहस करते थे। सामूहिक चर्चा करते थे। हम कोशिश करते थे कि चकमक क्लब की सामग्री का सदुपयोग हो। उससे चकमक क्लब के बच्चे रोज सीखें ही, साथ ही गांव के स्कूल के सब बच्चे, आस-पास के गांव के बच्चे भी सीखें। हम सब जो भी करते थे वह सब सचमुच का था- दिखावा बिलकुल नहीं। कुछ लोग कहते थे कि लड़के-लड़कियां चकमक क्लब जाने से बिगड़ जाएंगें। पढ़ाई-लिखाई तो करते नहीं हैं फेल हो जाएंगें। वहां पर तो वो मुसलमान है (चकमक क्लब के संयोजक एक मुस्लिम साथी थे जिनका चयन वहां के बच्चों और स्रोत साथियों ने किया था)। उनका तो सब खाना-पीना चलता है। बच्चों को मत जाने दिया करो वहां पर। घर वाले मुझसे खुश थे, क्योंकि उन्हें अब स्कूल जाने के लिए नहीं कहना पड़ता था। हम अपने ही गांव के स्कूल के बच्चों को सिखाने जाने लगे थे। तरह-तरह की किताबें घर पर पढ़कर सुनाते थे। छोटे बच्चे हमें भैय्या नमस्ते- भैय्या नमस्ते कहते थे। सभी साथियों का ईद पर किसी के घर सिवइयां खाने जाना, दीवाली पर खील-बतासे और मिठाई खाने जाना दिनो-दिन बढ़ता गया। इस तरह मिलने-जुलने का कभी घर वालों ने सीधे-सीधे विरोध नही किया। धीरे-धीरे हम सबके बीच प्रेम और दोस्ताना बढ़ता रहा। मैं दसवीं की परीक्षा दे रहा था। उस समय शाकिर भैय्या बाहर नौकरी करने जाने वाले थे। चकमक क्लब का नया संयोजक किसे बनाएं यह एक सवाल था। चर्चा के बाद चकमक क्लब के स्रोत साथियों एवं बच्चों ने मुझे संयोजक चुना। चकमक क्लब की दैनिक गतिविधियां, अंकुर पत्रिका का प्रकाशन, स्कूलों में बाल मेले, विज्ञान कार्यशालाएं, आदि शाकिर भाई के जाने के बाद भी हम साथी निरंतर जारी रख पाए। मैंने दसवीं के बाद विज्ञान विषय चुना था। गांव के स्कूल में सब विज्ञान को एक कठिन विषय के रूप में जानते थे। हमारे गांव में दसवीं, बारहवीं का परीक्षा परिणाम 35-40 प्रतिशत ही रहता था। अतः चकमक क्लब में हमने नियम बनाया कि जो भी साथी दसवीं या बारहवीं कक्षा में है, वे बाल मेले या चकमक क्लब के किसी भी कार्यक्रम में स्कूल या पढ़ाई छोड़कर नहीं जाएंगे। मैं भी बारहवीं में था। चकमक क्लब के स्रोत साथियों ने मुझे भी बाहर के कार्यक्रमों के लिए मना कर दिया। मैंने सन् 1999 में कक्षा बारहवीं 73 प्रतिशत अंकों के साथ उर्तीण की। घर, परिवार, स्कूल, चकमक क्लब, एकलव्य आदि सभी जगह लोग खुश थे। गांव में बारहवीं तक ही स्कूल था। शायद मेरे परिवार का सपना भी बारहवीं तक पढ़ाना ही था। मगर सोचा की अच्छे नम्बर आएं हैं तो बाहर पढ़ने जाना चाहिए। मैने इन्दौर जाना तय किया। इसके बाद चकमक क्लब के बच्चों, स्रोत साथियों तथा संयोजक ने मिलकर चकमक क्लब के एक अन्य साथी राकेश बिनौले को चकमक क्लब का नया संयोजक चुना। सोचने समझने वाले इंसान का बनना कहना यह चाहता हूं कि स्कूल और कॉलेज समाज से धर्म, जाति व लिंग के आधार पर समाज में होने वाले भेदभाव को उखाड़ फेकने में असफल ही हुए हैं। साथ ही साथ आर्थिक सत्ता को भी मजबूती प्रदान करते हैं- उसका समर्थक भी बनाते हैं। इससे अंततः एक हिन्दू परिवार में जन्मा बच्चा हिन्दू तथा मुसलमान परिवार में जन्मा बच्चा मुसलमान ही बना रहता है। शिक्षा, स्वास्थ्य में सुधार, गरीबी उन्मूलन, नारी सशक्तीकरण, अंधविश्वास निवारण, साम्प्रदायिक सद्भाव आदि के लिए विभिन्न संगठनों के द्वारा तरह-तरह के कार्यक्रम होते हैं। एक पक्ष किसी कार्यक्रम के आयोजनकर्ताओं का होता है, दूसरा पक्ष उनका जिनके लिए यह कार्यक्रम बनाया जाता है। इन कार्यक्रमों का अपना महत्व है, लेकिन ऐसा बहुत ही कम होता है कि हम खुद अपने विकास और अपनी समझ के लिए आयोजन एवं कार्यक्रमों का निर्धारण करते हों, सोचते हों, अपने पिछड़ेपन के कारणों को तलाश करते हों और उनके निवारण के लिए साझा प्रयास करते हों। अपने पिछले अनुभवों को याद करते हुए बार-बार लगता है कि चकमक क्लब जैसी जगह के होने से कितने बच्चे सोचने समझने वाले इंसान बने हैं। Reply |
Search |