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अवघट 3गोपाल सिंह चौहान बहुत छोटा था तो घर के पिछवाड़े के मंदिर में जाया करता था। वहां हर शनिवार को सुंदरकांड के पाठ में जाना और रामायण सुनना मुझे क्यों अच्छा लगता यह मुझे उस समय भी पता नहीं था और आज भी नहीं जानता। यह सगुण और निगुर्ण के बीच एक ऐसा अध्यात्म मुझे महसूस होता है जिसकी कोई वैचारिक पृष्ठभूमि मेरे जहन में नहीं है। मैं यह भी स्वीकार करता हूं कि यह मेरी खण्डित मान्यताओं से उपजा हुआ एक ऐसा अध्यात्म है जिसे हिन्दू होने के नाते मैंने आत्मसात किया। तुम तो ना हिन्दु हो और ना ही मुसलमान। तुम्हारा खेल तो दोनों या तीनों या हजारों में चलता है साधो! हिन्दू कहूं तो हूं नहीं तुमने कहां सीखा ये खेल, बताओगे? हम भी कुछ ऐसा ही खेलते हैं लेकिन तुम्हारी तरह हिन्दु-मुसलमान, हिन्दु-मुसलमान नहीं करते। हमारी जमात तो बहुत बड़ी है। इस खेल में कोई नहीं बचता। हमारे लिए सब बराबर हैं। तुम्हें अब भी भरोसा नहीं है कबीर तो सुनो! जो अहमदाबाद में हुआ उसमें कौन नहीं था जरा बताओ? फिर जयपुर में, फिर बैंगलौर में, फिर दिल्ली में। हिन्दु भी थे, मुसलमान भी थे, बच्चे भी थे, बड़े भी थे और हां स्त्रियां भी थी। अब और क्या गिनाउं नहीं तो तुम्हें शर्म आ जाएगी। तुम तो केवल दो के खिलाड़ी हो और हम!! हम हजारों के---- अभी हम उड़ीसा में खेल रहे हैं। हम तो सभी धर्मों की बात करते हैं तो फिर ईसाई भी तो हमारे देश के भाई ठहरे। उनके साथ खेलने में बड़ा मजा है। इसमें कुछ बाहर के भी खिलाड़ी है इसलिए मशकत ज्यादा है लेकिन फिर भी हम जीत ही गये समझो। उधर डेरा वाले भी बुला रहे हैं हमें। हमारे पास बहुत काम है, अब तुम्हारी तरह बाजार में खड़े होकर लुकाठी तो हम जलाएगें नहीं। तुम्हारे साथ तो 600 सालों में भी कोई आया नहीं और हम तो बिना किसी मशाल के ही आग लगाए हैं। तब तक तुम अपने तंबुरे के तार मिलाओ कबीर... मैं जरा एक एनकांउटर करके आता हूं!! अल्लाह ताला तुम्हारा |
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