अवघट 2

गोपाल सिंह चौहान

तुम्हारी गुनगुनाहट, तुम्हारा नाद और तुम। कितनी चोटें हैं मेरे पास तुम्हारी दी हुई। तंबूरे के एक एक तार के साथ चुभते हो सूल की तरह। और कोई रास्ता ना मिला तो शब्द बनकर आये। मैं अब शांत हूं और चुप भी। कितनी आसानी से कह दिया कि ये देखो ''शब्द की चोट''!! तुम अपने साधो से खेलते हो कबीर!! ये शब्द शब्द कहते कहते कब नि:शब्द की चोट मारोगे यह कौन जाने?

'' अब लफ़्ज-ओ-बयान सब ख़त्म हुए
अब लफ़्ज-ओ-बयान का काम नहीं
अब इश्क़ है ख़ुद पैग़ाम अपना
और इश्क़ का कुछ पैगाम नहीं ''

यह कैसी आशिकी सिखा रहे हो जो मुझे मुझसे ही दूर ले जाएगी। यह कौनसी दुनिया है जिसके बारे में सोचकर भी मैं कांपने लगता हूं। तुम मुझे डरना सीखा रहे हो या मिटना। तुम मुझे मेरा कौनसा घर जलाने की रिश्वत दे रहे हो? मैं कुछ जलाने वाला नहीं हूं। मेरा होना मेरी नियती है और मेरी पहचान मेरी जात। तुम कैसे रोकोगे मुझे लड़का होने से या किसी का प्रेमी। तुम जल रहे हो मुझसे कि कोई चाहता है मुझे अपनी जान से भी ज्यादा और तुम उम्र भर बनाते रहे दो-दो कोड़ियों के बिछौने। मेरा अपना ज्ञान मेरी दौलत है जिसे बेच कर ला सकता हूं कईं हजार बिछौने और सो सकता हूं कईं सालों तक एक चैन भरी नींद। तुम जिस बाजार में खड़े होकर बेच रहे थे वो कौनसी अधजली लुकाठी-

कबीरा खड़ा बाजार में, लिए लुकाठी हाथ
जो घर फूंके आपणा, चले हमारे साथ।

तुम भूल गये पीछे मुड़कर देखना जहां मैं खड़ा था बाजार को अपनी मुट्‌ठी में दबोचे और न जाने कितने लोग चाट रहे थे मेरे दायें पैर का अंगूठा।

तुम कौन सी दुनिया में हो साधो!! अब आदमी खुद से उपर है खुद को खोकर, यहां इक़ के पैगाम सियासत की सड़कों पर इंसान के खून से लिखे जाने लगे हैं, लफ्जो की कारीगरी इस हद तक गंवारा है कि एक जीता जागता इंसान इस दो में गरीबी रेखा के नीचे या उपर के अंतराल का लफ़्ज-ओ-बयान बन गया है। तुम बताओ साधो कि ये अपना घर कब फूंके जिनकी देह एक दिन अपने घर के सपने के साथ ही फूंक दी जाएगी!!! तुम उस समय इनको अपने साथ ले जाना कबीर!!

हिन्दू कहूं तो हूं नहीं
मुसलमान भी नाहीं
ग़ैबी दोनों दीन में
खेलूं दोनों मांही

तुम्हारा
साधो!!