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अवघटगोपाल सिंह चौहान कबीर एक खोज है एक ऐसी यात्रा जिसका ना कोई पड़ाव और ना कोई मंजिल। मंजिल या तो जाने के लिए होती है या पाने के लिए लेकिन यह तो एक अनजाना सा अनुभव है जिसका होना ही भीतर एक गुदगुदी पैदा करता है। एक ऐसी उर्जा जो अपने भीतर करोड़ों छिद्रों से होती हुई आपको तड़पने के लिए मजबूर करती है। यह कभी 'हां और ना' के बीच का अंतराल बन कर गुनगुनाती है तो कभी 'सब हैं हम माय' का खेल रचते हुए हमें 'बहुरी अकेला' छोड़ देती है। "हां कहूं तो है नहीं, ना भी कहयो नहीं जाए यह हां और ना कहां मुझे अकेला छोड़ती है साधो! फिक्रों में जिंदगी कब भीड़ सी हो गयी और कब भीड़ मुझ सी। कितनी बार तो सुना था मैंने, बार-बार हर बार तुम्हें किताबों में, स्कूल की दो घंटियों के बीच, अक्षरों के घने जंगल में कैसे पसरे रहते थे तुम। वो डंडे वाला आदमी चिल्लाता- कबीर, कबीर, कबीर और मेरे कान हो जाते थे हर बार सुन्न! कई बार तो यह कहते हुए भी तुमको मैंने गाली दी कि तुम पैदा हुए तो मरे क्यों और मरे तो पैदा क्यूं हुए। तुम्हें हमारी परीक्षा में आने की क्या जरूरत थी? क्यों नहीं किया तुमने केवल जुलाहे का काम? ये चदरिया इतनी झीनी क्यों बीनी रे कबीर! इतने सालों बाद तुम वापस क्यों आये साधो? मैंने स्कूल भी छोड़ दी है और नहीं रटना मुझे तुम्हें किसी परीक्षा के लिए। चले जाओ वापस और पसर जाओ उन्हीं जंगलों में जहां से तुम मुझ लेने आये हो। मुझे नहीं पीना तुम्हारे किसी अवघट का पानी और ना ही सुननी है किसी गगन की कोई झीनी झीनी आवाज। तुम मुझे क्यों सुना रहे हो ये ओहम सोहम के बाजे कबीर!!!! वह नहीं रूकता और चला आया मेरे भीतर मुझे बिना सुने। यह कैसा प्रवेश है जिसका कोई स्वागत नहीं। यह कौन सा कबीर है जिसे मैं जानता तक नहीं। यह कैसी बानी है जिसकी कोई आवाज नहीं। यह कौन सी रिमझिम है जिसकी कोई बूंद नहीं। यह क्या है जो है नहीं? घाटे पानी सब भरे, अवघट भरे न कोय तुम्हारा, |
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